Gopal Kavi aur Unki Vrindavan dhamanuragavali – एक परिचय
गोपाल कवि राधा-वल्लभ परंपरा के रसिक भक्त-कवि माने जाते हैं। उनकी काव्यधारा में श्री राधा के प्रति अनन्य प्रेम, सखी-भाव और वृंदावन-रस की गहन अनुभूति प्रमुख रूप से व्यक्त होती है। वे बाह्य आडंबर से दूर, अंतरंग भक्ति और भाव-साधना को प्रधान मानते हैं।
📖 “वृंदावन धामानुरागावली” का स्वरूप
“वृंदावन धामानुरागावली” नाम से ही स्पष्ट है कि यह काव्य वृंदावन धाम के प्रति अनन्य अनुराग (प्रेम) का संग्रह है। इसमें ब्रजभूमि की महिमा, निकुंज-लीलाओं की रसपूर्ण झलक, तथा राधा-नाम की माधुर्य महिमा का भावपूर्ण वर्णन मिलता है।
🔹 मुख्य विशेषताएँ
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वृंदावन की महिमा
– धाम को दिव्य चेतन सत्ता के रूप में चित्रित किया गया है।
– प्रत्येक कुंज, वन, यमुना तट को प्रेम-रस से ओतप्रोत बताया गया है। -
राधा-केंद्रित भक्ति
– श्री राधा को ही परम आश्रय और आराध्य रूप में स्वीकार किया गया है।
– कृष्ण भी राधा के अधीन प्रेमस्वरूप में चित्रित होते हैं। -
सखी-भाव की प्रधानता
– साधक को सखी-भाव से निकुंज-सेवा का अधिकारी बताया गया है।
– सेवा और स्मरण को साधना का मूल माना गया है। -
ब्रजभाषा की मधुरता
– भाषा सरल, कोमल और रसपूर्ण है।
– पदों में लयात्मकता और भावप्रवणता विशेष आकर्षण है।
🌸 आध्यात्मिक संदेश
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वृंदावन केवल भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि हृदय की अवस्था है।
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जब साधक का मन राधा-नाम में लीन हो जाता है, तभी सच्चा “धाम-अनुराग” प्रकट होता है।
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बाह्य तीर्थ से अधिक महत्त्व अंतःकरण की शुद्धता और प्रेम का है।

















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