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औत्सविक पदावली का परिशिष्ट भाग (चाचा श्रीहित वृंदावनदासजी की वाणी) – Chacha Vrindavandas Ji Ki Vani Ka Ashvik padawali Parishist Bhag

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Sri Hita Vrindavandas जी की वाणी में “अश्विक पदावली – परिशिष्ट भाग” राधा-वल्लभ रस परंपरा का अत्यंत अंतरंग और रसपूर्ण अंश माना जाता है। इसमें मुख्य रूप से सखी-भाव, निकुंज-लीला, और श्री राधा नाम की अनन्य महिमा का निरूपण मिलता है।

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Description

Sri Hita Vrindavandas जी की वाणी में “अश्विक पदावली – परिशिष्ट भाग” राधा-वल्लभ रस परंपरा का अत्यंत अंतरंग और रसपूर्ण अंश माना जाता है। इसमें मुख्य रूप से सखी-भाव, निकुंज-लीला, और श्री राधा नाम की अनन्य महिमा का निरूपण मिलता है।

🔹 “अश्विक पदावली – परिशिष्ट” का भावार्थ

  • यह भाग साधारण भक्तों के लिए नहीं, बल्कि रसिक-भाव से युक्त साधकों के लिए माना जाता है।

  • इसमें श्री राधा जी के स्वरूप, उनकी निकुंज-सेवा और अंतरंग लीलाओं का सांकेतिक एवं भावमय वर्णन है।

  • भाषा ब्रजभाषा में है और शैली अत्यंत कोमल, रहस्यमयी एवं प्रेममयी है।

🔹 मुख्य विषय

  1. श्री राधा की परमानंदमयी महिमा

  2. सखी-भाव से सेवा का आदर्श

  3. अंतरंग निकुंज-लीला का संकेतात्मक वर्णन

  4. अनन्य राधा-आश्रय का महत्व

🔹 उदाहरण रूप में एक पद (शैलीगत प्रस्तुति)

राधा रस बरसत अति गूढ़, सखि! कहौं किस भाँति।
हित वृंदावन दास यह, रहस्य रहे न जाहिं॥

नाम प्रताप अपार अति, मिटै भव भय त्रास।
चरण शरण जो आइये, तजि दे सकल विलास॥


यदि आप चाहें तो मैं:

  • “अश्विक पदावली – परिशिष्ट” के किसी विशेष पद का मूल पाठ,

  • या उसका सरल हिंदी अर्थ,

  • या उसका रसात्मक/आध्यात्मिक विश्लेषण विस्तार से प्रस्तुत कर सकता हूँ।

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