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Ashtayam Sewa Samay Prabandha By Chacha Shrihit Vrindavandas | चाचा श्रीहित वृन्दावनदास

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अष्टयाम सेवा समय प्रबन्ध” राधा-वल्लभ परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधना-ग्रंथ है। इसमें श्री राधा-कृष्ण की अष्टयाम (दिन-रात के आठ प्रहरों) के अनुसार सेवा-विधान का सूक्ष्म और रसपूर्ण वर्णन मिलता है।

यह ग्रंथ विशेष रूप से उन साधकों के लिए मार्गदर्शक है जो सखी-भाव और अंतरंग निकुंज-सेवा की भावना से भजन करना चाहते हैं।

राधा-वल्लभ परंपरा में अष्टयाम सेवा केवल समय-विभाजन नहीं, बल्कि हृदय की निरंतर भाव-यात्रा है। साधक सखी-भाव से प्रत्येक याम में श्रीजी की मानसी सेवा करता है।

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Description

Ashtayam Sewa Samay Prabandha रचयिता: Chacha Shrihit Vrindavandas

“अष्टयाम सेवा समय प्रबन्ध” राधा-वल्लभ परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधना-ग्रंथ है। इसमें श्री राधा-कृष्ण की अष्टयाम (दिन-रात के आठ प्रहरों) के अनुसार सेवा-विधान का सूक्ष्म और रसपूर्ण वर्णन मिलता है।

यह ग्रंथ विशेष रूप से उन साधकों के लिए मार्गदर्शक है जो सखी-भाव और अंतरंग निकुंज-सेवा की भावना से भजन करना चाहते हैं।

राधा-वल्लभ परंपरा में अष्टयाम सेवा केवल समय-विभाजन नहीं, बल्कि हृदय की निरंतर भाव-यात्रा है। साधक सखी-भाव से प्रत्येक याम में श्रीजी की मानसी सेवा करता है। नीचे आठों याम का रसात्मक वर्णन प्रस्तुत है:


1️⃣ मंगला (प्रातः ब्रह्ममुहूर्त)

रात्रि के मधुर विश्राम के पश्चात् सखियाँ मंद-मंद स्वर में जागरण करती हैं।
साधक भाव करता है कि वह भी सखियों संग निकुंज-द्वार पर उपस्थित है।
श्रीजी की निद्रा-भंग न हो, इस कोमलता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

भाव: नवीन प्रभात जैसा निर्मल हृदय।


2️⃣ श्रृंगार

स्नान, सुगंधित द्रव्य, पुष्प-विन्यास, वस्त्र और आभूषणों से अलंकरण।
साधक सखी बनकर दर्पण दिखाता है, वेणी गूँथता है, तिलक करता है।

भाव: सेवा में सौंदर्य और अनुराग का समर्पण।


3️⃣ ग्वाल/पूर्वाह्न विहार

वन-विहार की तैयारी, सखियों संग कुंज-गमन।
वृंदावन की लताओं, यमुना-तट और मधुर हास्य-विनोद का चिंतन।

भाव: सहजता, चपलता और लीलामय आनंद।


4️⃣ राजभोग (मध्याह्न)

विविध व्यंजन, मधुर फल और स्नेह-भरा भोग अर्पण।
साधक मानसी रूप से थाल सजाता है और प्रेम से परोसता है।

भाव: अर्पण में पूर्ण समर्पण और तृप्ति।


5️⃣ उत्थापन (अपराह्न)

लघु विश्राम के पश्चात पुनः जागरण।
मंद मुस्कान और कोमल वार्ता का चिंतन।

भाव: पुनः मिलन की ताजगी।


6️⃣ सायंकालीन भोग

संध्या समीप है, वातावरण शांत और सौम्य।
हल्के भोग, दीप-प्रकाश और मधुर संगीत।

भाव: दिनभर की लीला का मधुर संकलन।


7️⃣ संध्या-आरती

दीपों की पंक्ति, कर्पूर-आरती, सखियों का गान।
साधक हृदय-दीप प्रज्वलित कर आरती करता है।

भाव: कृतज्ञता और आभार।


8️⃣ शयन एवं निकुंज-चिंतन

रात्रि की गहन शांति।
सखियाँ शयन-व्यवस्था करती हैं।
साधक दूर रहकर केवल अंतरंग सेवा-भाव का स्मरण करता है।

भाव: विनय, लज्जा और पूर्ण समर्पण।


✨ समग्र साधना का सार

  • प्रत्येक याम में स्मरण ही सेवा है

  • बाह्य कर्म से अधिक महत्त्व अंतःकरण की पवित्रता का है।

  • साधक का लक्ष्य है — दिन-रात चित्त का अखंड राधा-आश्रय।

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