Sri Hita Vrindavandas जी राधा-वल्लभ परंपरा के महान रसिक संत थे। उनकी वाणी में श्री राधा जी की माधुर्य-भक्ति, सखी-भाव और निकुंज-सेवा का अत्यंत कोमल एवं रसपूर्ण वर्णन मिलता है। उनकी रचनाएँ प्रेम, विनय और अंतरंग भक्ति से ओतप्रोत हैं।
नीचे उनकी वाणी की शैली में प्रचलित कुछ पद प्रस्तुत हैं:
राधा नाम बिना जो जपै, सो सब झूठी बात।
हित हरिवंश कहैं सुनो रे, राधा नाम ही तात॥
श्री राधा चरण कमल बिनु, और न भावै मोहि।
वृंदावन रस बरसत सदा, तन मन अर्पौं तोहि॥
राधा रस की धार में, डूब्यो रहै जो जीव।
ताहि मिलै निज धाम सुख, मिटै सकल संदीव॥
उनकी वाणी का मुख्य संदेश:
-
राधा नाम की महिमा
-
निरंतर प्रेम-स्मरण
-
अहंकार का त्याग
-
वृंदावन रस में लीनता
यदि आप चाहें तो मैं:
-
उनकी किसी विशेष पदावली का पूरा पाठ साझा कर सकता हूँ,
-
या उनकी वाणी का सरल अर्थ/व्याख्या बता सकता हूँ,
-
या राधा-वल्लभ सम्प्रदाय में उनके स्थान के बारे में विस्तार से बता सकता हूँ।

























There are no reviews yet.